जेएनयू छात्र नेता से क्रांतिकारी नायक चंद्रशेखर प्रसाद बनने की कहानी… उनके शहादत दिवस पर

0
508

उस दौर की बात है, जब जेएनयू कैंपस में एक युवा छात्रनेता अपने साथियाें से कह रहा था, ‘हम अगर कहीं जाएंगे तो हमारे कंधे पर उन दबी हुई आवाज़ों की शक्ति होगी जिनको बचाने की बात हम सड़कों पर करते हैं. अगर व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा होगी तो भगत सिंह जैसे शहीद होने की महत्वाकांक्षा होगी, न कि जेएनयू से इलेक्शन में गांठ जोड़कर चुनाव जीतने और हारने की महत्वाकांक्षा होगी.’

दबी हुई आवाज़ों को बचाने की अलख जगाने वाले इस युवक का नाम था चंद्रशेखर प्रसाद उर्फ चंदू जिनका जन्म 20 सितम्बर 1964 को बिहार के सिवान में हुआ वहां के लोग चंद्रशेखर प्रसाद को चंदू के नाम से जानते हैं| इनके पिता का नाम जीवन सिंह और माँ का नाम कौशल्या देवी है| आठ साल की उम्र में पिताजी का देहांत हो गया| शुरुआती शिक्षा गाँव में ही ली, बाद में  सैनिक स्कूल तिलैया से इंटरमीडियट तक की शिक्षा प्राप्त किया चंदू को देश की सेवा करनी थी| उन्होंने इंडियन नेशनल डिफेंस एकेडमी भी ज्वाइन किया| लेकिन वहाँ उन्हें एहसास हुआ, देश की सेवा के लिए उन्हें राजनीति का रास्ता अख्तियार करना चाहिए| वो लौट आये| पटना विश्वविद्यालय के छात्र बने| छात्र ही नहीं, छात्र नेता बने| और एआईएसएफ के राज्य उपाध्यक्ष के पद तक पहुंचे.

बाद में वे जेएनयू पहुंचे तो कम्युनिस्ट पार्टी आॅफ इंडिया लिबरेशन की छात्र इकाई आइसा के साथ अपना राजनीतिक सफर शुरू किया. जन सेवा में गहरी रुचि रखने वाले चंदू ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा| उनकी विचारधारा के लोग कायल बनते गये| आइसा से जुड़ने के बाद वो लगातार छात्रों की समस्याओं के लिए लड़ते रहे| कई बार अपनी व्यक्तिगत जिन्दगी को पीछे रख कर अन्य छात्र के हित में कदम उठाये| एक छात्र नेता के रूप में वे बहुत तेजी से उभरे और लोकप्रिय हुए. 1993-94 में जेएनयू छात्रसंघ के उपाध्यक्ष चुने गए और फिर लगातार दो बार अध्यक्ष चुने गए. इसके बाद वे ज़मीनी स्तर पर काम करने के मक़सद से अपने गृह ज़िले सीवान गए।

31 मार्च, 1997 को जेएनयू के छात्रों को ख़बर मिली कि दो बार जेएनयू छात्रसंघ अध्यक्ष रह चुके चंद्रशेखर को बिहार के सीवान में सरेबाज़ार गोलियों से भून दिया गया है. वही चंद्रशेखर जो अपने दोस्तों के बीच चंदू थे, वही चंद्रशेखर जो अपने जेएनयू के छात्रों के कहकर गए थे- ‘हमारी आने वाली पीढ़ियां सवाल करेंगी, वे हमसे पूछेंगी कि जब नई सामाजिक ताक़तें उभर रही थीं तो आप कहां थे, वे पूछेंगी कि जब लोग जो हर दिन जीते-मरते हैं, अपने हक़ के लिए संघर्ष कर रहे थे, आप कहां थे जब दबे-कुचले लोग अपनी आवाज़ उठा रहे थे, वे हम सबसे सवाल करेंगीं.’

यूनिवर्सिटी छोड़ के जनसमूह के बीच में काम करने के मकसद से अपने राज्य में वापस आये| उन्हें जनता का भरपूर समर्थन मिल रहा था| 3 अप्रेल 1997 को होने वाले भाकपा(माले) के बिहार बंद को सफल बनाने के लिए 31 मार्च को सिवान के जे.पी. चौक पर थे| उस नुक्कड़ सभा को संबोधित करने का मकसद जनता से इस आन्दोलन को सफल बनाने के लिए अपील करना था|


तात्कालिक सरकार में शामिल शहाबुद्दीन को साफ़ तौर पर अपने लिए खतरा दिख रहा था| वो जानते थे इस बार मुद्दा उनके द्वारा फैलाये जा रहे हिंसा और भ्रष्टाचार का होगा| वो जानते थे कि ये शख्स उनकी जड़ों को उखाड़ के फेंक सकता था| शहाबुद्दीन के खौफ की वजह से जनता में कोई ऐसा नहीं था जो उसके खिलाफ आवाज उठा सके| उस नुक्कड़ सभा में और उसके बाद भी यही दुस्साहस चंदू करने वाले थे|
उसी सभा में चंदू और उनके एक साथी को गोलियों से भून दिया गया| शहाबुद्दीन के खिलाफ उठने वाली आवाज को हमेशा के लिए शांत कर दिया गया|

उस समय बिहार में धर्मनिरपेक्षता, सामाजिक न्याय और पिछड़ों के मसीहा लालू प्रसाद यादव की सरकार थी. चंदू की हत्या पर जेएनयू के छात्र भड़क उठे. नाराज़ छात्रों का हुजूम लालू यादव से जवाब मांगने दिल्ली के बिहार भवन पहुंचा तो वहां भी पुलिस की गोलियों से उनका स्वागत हुआ. चंदू की हत्या का आरोप लालू यादव की पार्टी के सांसद शहाबुद्दीन पर था और प्रदर्शनकारी छात्रों पर गोली चलाने का आरोप पुलिस के साथ-साथ साधु यादव पर.

चंदू की हत्या के बाद देश भर में प्रदर्शन शुरू हो गए. चंद्रशेखर के गांव बिंदुसार में देश भर से हज़ारों छात्र पहुंचे और चंदू की मां के नेतृत्व में मार्च निकाला गया. इस सभा को संबोधित करते हुए चंदू की बूढ़ी मां कौशल्या देवी ने कहा था, ‘मेरा बेटा मर कर भी अमर है और सदा अमर रहेगा. मेरी झोपड़ी को झोपड़ी मत आंकना. इस झोपड़ी की बहुत कीमत है… मेरा बेटा मरा नहीं है. ये हज़ारों लाल मेरे बेटे हैं.’

चंदू के गांव से चलकर हज़ारों नौजवानों का जुलूस सीवान के जेपी चौक पहुंचा. बताते हैं कि इतना बड़ा जुलूस सीवान में शायद ही कभी निकला हो. दिल्ली में छात्र और बुद्धिजीवियों ने भारी विरोध मार्च निकाला. यह प्रदर्शन पूरे देश में हुआ और शहाबुद्दीन और साधु यादव को सज़ा देने की मांग की गई. जेएनयू के छात्रों के विरोध मार्च पर पुलिसिया लाठीचार्ज में बड़ी संख्या में लड़के लड़कियां घायल हुए. चंदू की हत्या के बाद दो अप्रैल का बंद और व्यापक हो गया और क़रीब-क़रीब हिंसक भी रहा. पूरे बिहार में जनता सड़क पर उतरी.

तत्कालीन प्रधानमंत्री इंद्रकुमार गुजराल ने दिल्ली से राहत राशि के रूप में एक लाख रुपये का चेक भेजा तो चंदू की मां ने यह कहकर लौटा दिया कि ‘बेटे की शहादत के एवज में मैं कोई भी राशि लेना अपमान समझती हूं… मैं उन्हें लानतें भेज रही हूं जिन्होंने मेरे बेटे की जान की क़ीमत लगाई. एक ऐसी मां के लिए, जिसका इतना बड़ा बेटा मार दिया गया हो और जो यह भी जानती हो कि उसका क़ातिल कौन है, एकमात्र काम हो सकता है, वह यह है कि क़ातिल को सज़ा मिले. मेरा मन तभी शांत होगा महोदय. मेरी एक ही क़ीमत है, एक ही मांग है कि अपने दुलारे शहाबुद्दीन को क़िले से बाहर करो या तो उसे फांसी दो या फिर लोगों को यह हक़ दो कि उसे गोली से उड़ा दें.’

तत्कालीन सरकार से मांग की गई कि शहाबुद्दीन की संसद सदस्यता खारिज की जाए और बिहार आवास पर प्रदर्शन के दौरान छात्रों पर गोली चलाने वाले साधु यादव को गिरफ़्तार किया जाए. प्रधानमंत्री गुजराल ने इन मांगों को अव्यवहारिक बताया. सांसद शहाबुद्दीन गिरफ़्तार हुए, लेकिन उनके ख़िलाफ़ ठोस सबूत और गवाह नहीं मिले. वे जमानत पर छूट गए.

अदालत में यह मामला 15 साल तक खिंचा. आख़िरकार बाहुबली नेताओं से संबंध रखने वाले तीन शार्प-शूटरों को उम्रक़ैद की सज़ा मिली. शहाबुद्दीन को जेल तो हुई लेकिन अन्य मामलों में. उनके खिलाफ चंद्रशेखर हत्याकांड और अन्य कई मामलों में गवाहों पर इतना अधिक दबाव डाला गया कि कई गवाह घर छोड़कर भाग गए या फिर गवाही से पलट गए. उस दौर में बिहार में शहाबुद्दीन की तूती बोलती थी.

चंदू जब जेएनयूएसयू के उपाध्यक्ष थे, तभी प्रणय कृष्ण अध्यक्ष थे. प्रणय कहते हैं, ‘प्रतिलिपियों से भरी इस दुनिया में चंदू मौलिक होने की जिद के साथ अड़े रहे. हमारी दोस्त प्रथमा कहती थी, ‘वह रेयर आदमी हैं.’ 91-92 में जेएनयू में हमारी तिकड़ी बन गई थी. राजनीति, कविता, संगीत, आवेग और रहन-सहन- सभी में हम एक से थे. हमारा नारा था, ‘पोएट्री, पैशन एंड पाॅलिटिक्स.’

चंदू इस नारे के सबसे ज़्यादा क़रीब थे. समय, परिस्थिति और मौत ने हम तीनों को अलग-अलग ठिकाने लगाया, लेकिन तब तक हम एक-दूसरे के भीतर जीने लगे थे. चंदू कुछ इस तरह जिये कि हमारी कसौटी बनते चले गए. बहुत कुछ स्वाभिमान, ईमान, हिम्मत, मौलिकता और कल्पना- जिसे हम ज़िंदगी की राह में खोते जाते हैं, चंदू उन सारी खोई चीज़ों को हमें वापस दिलाते रहे.’

भाकपा माले की नेता कविता कृष्णन कहती हैं, ‘चंद्रशेखर जैसे युवा का होना जेएनयू की भूमिका को दिखाता है. वे जेएनयू की पैदावार थे और ग़रीबों के पक्ष में लड़ने निकले थे. चंद्रशेखर की जो हत्या हुई, उससे पहले भी कई लोगों की हत्या हो चुकी थी. चंद्रशेखर यह जानते थे कि वहां ख़तरा है लेकिन उन्होंने चुना कि मैं वहां का हूं और वहीं जाकर काम करूंगा. वे वहां गए और वहां राजद सांसद ने उनकी हत्या करवाई.’

चंदू के व्यक्तित्व के बारे में कविता कहती हैं, ‘जितने लोग चंद्रशेखर को जानते थे, वे जानते थे कि उनमें कुछ ख़ास बात थी. वे कोई बहुत करिश्माई नेता नहीं थे. उनकी ख़ास बात थी कि वे 24 घंटे लोगों के लिए समर्पित रहते थे. साधारण से साधारण छात्र कभी भी उनके पास जाकर मदद मांगता था और वे प्रस्तुत रहते थे. जनता के लिए उनमें वास्तविक प्रेम था. उनका समर्पण उनकी ख़ास बात थी. उनके सीवान जाने के बाद विरोधियों को पता था कि वे एक जननेता के रूप में उभर रहे हैं. इस ख़तरे से बचने के लिए उनकी हत्या कर दी गई.’

चंद्रशेखर के समय आइसा के राष्ट्रीय अध्यक्ष रह चुके वी. शंकर कहते हैं, ‘चंदू मास लीडर था. वह होता तो जनता का नेता होता. वह हमारा बहुत महत्वपूर्ण कॉमरेड था. जेएनयू में अध्यक्ष बनने के बावजूद उसने गांव जाकर काम करने को तवज्जो दी और वहां उसे ख़ूब समर्थन मिल रहा था. चंदू की हत्या के बाद सीवान में हुई रैली ऐतिहासिक थी. वह बेहद पढ़ा लिखा, समझदार और जनता की आकांक्षाओं को समझने वाला नेता था, जिसे मार दिया गया.’

जिन लोगों को युवा नेतृत्व में भरोसा है, उनके लिए चंद्रशेखर एक बहुत बड़ी उम्मीद का नाम था, जिसे यह देश संभाल नहीं पाया. चंदू में एक अंतरराष्ट्रीय नेता के रूप में उभरने की संभावनाएं भी मौजूद थीं.

प्रणय अपने एक लेख में लिखते हैं, ‘1995 में दक्षिणी कोरिया में आयोजित संयुक्त युवा सम्मेलन में वे भारत का प्रतिनिधित्व कर रहे थे. जब वे अमेरिकी साम्राज्यवाद के खिलाफ राजनीतिक प्रस्ताव लाए तो उन्हें यह प्रस्ताव सदन के सामने नहीं रखने दिया गया. समय की कमी का बहाना बनाया गया. चंद्रेशेखर ने वहीं आॅस्ट्रेलिया, पाकिस्तान, बांग्लादेश और तीसरी दुनिया के देशों के अन्य प्रतिनिधियों का एक ब्लाॅक बनाया और सम्मेलन का बहिष्कार कर दिया. इसके बाद वे कोरियाई एकीकरण और भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ चल रहे ज़बरदस्त कम्युनिस्ट छात्र आंदोलन के भूमिगत नेताओं से मिले और सियोल में बीस हज़ार छात्रों की एक रैली को संबोधित किया. यह एक ख़तरनाक काम था जिसे उन्होंने वापस डिपोर्ट कर दिए जाने का ख़तरा उठाकर भी अंजाम दिया.’

चंदू के बारे में एक मशहूर घटना है. 1993 में छात्रसंघ के चुनाव के दौरान छात्रों से संवाद में किसी ने उनसे पूछा, ‘क्या आप किसी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा के लिए चुनाव लड़ रहे हैं?’ इसके जवाब में उन्होंने कहा था, ‘हां, मेरी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा है- भगत सिंह की तरह जीवन, चे ग्वेरा की तरह मौत.’ उनके दोस्त गर्व से कहते हैं कि चंदू ने अपना वायदा पूरा किया.

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here